”माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर” इस दोहे का सार क्या है?
”माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर” इस दोहे का सार क्या है?
Detailed Solution & Logic
मन पर नियंत्रण ज़रूरी है
“माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर” — इस दोहे का सार क्या है?
यह प्रसिद्ध दोहा Kabir का है।
पूरा दोहा:
माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर।
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर॥
सार:
कबीर जी कहना चाहते हैं कि केवल हाथों से माला जपने से कुछ नहीं होता, यदि मन शुद्ध नहीं है।
मन को नियंत्रित करना और अपने विचारों को सुधारना अधिक महत्वपूर्ण है।
✅ सही उत्तर: मन पर नियंत्रण ज़रूरी है
अन्य विकल्प क्यों गलत?
❌ माला फेरने से लाभ होता है → दोहे का संदेश इसके विपरीत है।
❌ पूजा से स्वर्ग मिलता है → यह दोहे का मुख्य अर्थ नहीं है।
❌ मेहनत सबकुछ है → संदर्भ से संबंधित नहीं।
Extra Facts:
- Kabir निर्गुण भक्ति धारा के प्रमुख संत थे।
- उनकी रचनाएँ Bijak में संकलित हैं।
- वे बाहरी आडंबरों की बजाय आंतरिक शुद्धता पर बल देते थे।
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